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सनातन का अर्थ है शाश्वत। यानी ऐसा सत्य जिसे कभी भी मिटाया या झुठलाया न जा सके। हिंदू और सनातन धर्म को मानने वाले इसी सत्य के सिद्धांत पर विश्वास करते हैं। उनका मानना है कि ईश्वर ऐसी शक्ति है जो पूरे ब्रह्मांड का संचालन कर रही है और वही शाश्वत भी है। यानी ईश्वर को कभी भी झुठलाया या मिटाया नहीं जा सकता। हिंदू और सनातन धर्म के लोग ईश्वर के इसी शाश्वत स्वरूप पर विश्वास करते हैं। मिलती-जुलती शिक्षाओं, वेद-पुराणों के कथन पर दोनों ही धर्म को मानने वाले लोगों का भरोसा हैं। यही कारण है कि सनातन धर्म को हिंदू धर्म भी कहा जाता है। लेकिन, वेदों के अनुसार सनातन धर्म की उत्पत्ति पृथ्वी पर सभ्यताओं या मानव की उत्पत्ति से भी सहस़्त्रों वर्शों पहले हो गई थी।

ऋषि-मुनि इसी धर्म की शिक्षाओं और वेद-पुराणों में लिखी बातों का प्रचार कर रहे थे। किंतु, सिंधु घाटी सभ्यता के विकसित होने के बाद आर्यावर्त के लोगों को हिंदू कहा जाने लगा और यहीं से हिंदू धर्म भी अस्तित्व में आया। सत्य यही है कि हिंदू धर्म सनातन संस्कृति का हिस्सा है, जिसमें मनुष्य के कर्तव्यों का निर्धारण किया गया है। लोक कल्याण के लिए उसकी जिम्म्मेदारी का निर्धारण भी किया गया है और प्रकृति को जननी माना गया है।
 

सनातन धर्म का अर्थः

 
सनातन धर्म में तीन शाश्वत सत्यों की बात कही गई है। ईश्वर सत्य है, आत्मा सत्य है और मोक्ष भी सत्य है। मोक्ष के इसी सत्य का मार्ग बताने वाला धर्म सनातन है। यानी ऐसा सत्य जो अनादि काल से चला आ रहा है और इसका न अंत है और न ही आदि। सनातन धर्म का सूत्र वाक्य है 

सत्यम, शिवम्, सुंदरम्। यह धर्म कहता है कि जीवन का पथ सनातन है और सभी मनुष्य व देवता इसी पथ से ही पैदा हुए हैं और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति करनी ही है।

सभी के अंदर ईश्वर के रूप में शाश्वत सत्य विद्यमान है, जिसे कभी भी मिटाया नहीं जा सकता। इसीलिए इस धर्म में आत्मा के अजर-अमर व पुर्नजन्म की बात भी कही गई है। क्योंकि, ईश्वर रूपी आत्मा अकाट्य है। उसे न तो काटा जा सकता है और उन ही जलाया, भियोगा या मारा जा सकता है। आत्मा सिर्फ अपना शरीर मात्र ही बदलती है और संसार में विचरण करती है। सनातनी होने का अर्थ उस ऊर्जा को महसूस करना है जो इस संसार की प्रत्येक वस्तु में निहित है और उसे ईश्वर द्वारा ही बनाया गया है। वेदों व पुराणों में भी लिखा है कि संसार में कण-कण में ईश्वर का वास है और प्रत्येक वस्तु उसकी ही रचना है।
 

सनातन धर्म बनाम हिंदुत्व:

सनातन धर्म और हिंदुत्व में कहीं भी कोई विरोधाभास देखने को नहीं मिलता। दोनों धर्मों का धर्मशास्त्र वेद और पुराणों में लिखा हुआ है। विज्ञान जब वस्तु, विचार व तत्वों को मूल्यांकन करता है जब कई धर्मों के सिद्धांत झूठे साबित हो जाते है। लेकिन, वेदों व पुराणों में लिखे तर्कों पर विज्ञान भी चकित हो उठता है। सनातन धर्म मोक्ष की बात करता है। उसके अनुसार ईश्वर अजन्मा है। न ही उसने जन्म लिया है और न ही उसे जन्म लेने की आवश्यक्ता है। ईश्वर तक पहुंचने का एक ही मार्ग भी बताया गया है वह मार्ग है मोक्ष।

हमारे ऋषियों ने योग और ध्यान से ब्रह्म व ब्रह्मांड के कई रहस्यों से पर्दा उठाकर मोक्ष के मार्ग का सिद्धांत दिया है। मोक्ष के बिना आत्मा की कोई गति नहीं है। धीरे-धीरे विज्ञान भी वेद-पुराणों में लिखी गई इन बातों से सहमत होता नजर आ रहा है। जहां तक हिंदुत्व की बात है तो पारसियों की धर्म पुस्तक अवेस्ता में हिंदू और आर्य शब्द का उल्लेख मिलता है। हालांकि, इतिहासकारों के मुताबिक चीनी यात्री हुएनसांग के समय हिंदू शब्द की उत्पत्ति इंदु यानी की चांद से हुई थी। दरअसल, हिंदू धर्म में ज्योतिषगणना का आधार चंद्रमास ही है। इसलिए इसे इंदु यानी हिंदू कहा जाने लगा।
 

सनातन धर्म के सिद्धांतः

जिस भी शरीर को आत्मा प्राप्त हुई है या फिर से जिस किसी ने भी पृथ्वी पर जन्म लिया है। उसका कर्तव्य निर्धारित है। ईश्वर व जनकल्याण के लिए उसकी कुछ जिम्मेदारियां हैं। लेकिन, इन जिम्मेदारियों को पूरा करने के बाद व्यक्ति को पंचतत्व में विलीन हो जाना है यही सनातन धर्म का अंतिम और अकाट्य सत्य भी है। लेकिन, इस धर्म का मूल सिद्धांत है- ज्ञान, योग व क्षेम

यानी धरती पर जन्म लेने के बाद उस ज्ञान प्राप्ति में लग जाओ जो आपको पता नहीं है। अपने चिंतन, मनन, अनुभव, अभ्यास व दर्शन से उस अप्राप्त ज्ञान को प्राप्त करना सनातनी होने का पहला सिद्धांत है। इसके बाद दूसरा सिद्धांत है योग, अर्थात जो कुछ आपको नहीं प्राप्त है उसके लिए योग करना। सनातन धर्म सदैव आपको प्रश्न करने की अनुमति देता है। इसका आशय है कि प्रश्न करने से ही ज्ञान की प्राप्ति होती है और इसी ज्ञान से अप्राप्त को प्राप्त किया जा सकता है। तीसरा सिद्धांत क्षेम की बात करता है। क्षेम का तात्पर्य है रक्षा करना।

यानी कि जो कुछ आपने अपने ज्ञान व योग से प्राप्त किया है, उसकी जीवन भर रक्षा करो और मिटने न दो साथ ही दूसरों तक उस ज्ञान व योग का प्रसार करो। सनातन धर्म यह कभी नहीं कहता कि जो कुछ लिखा है, वही करो। एक सनातनी को अपने अनुभव व अभ्यास के आधार पर स्वयं अपना मार्ग खोजना चाहिए। क्योंकि, जो भी जन्मा है उसका मार्ग तो अलग है किंतु मंजिल एक है। वह है मोक्ष।

सनातन धर्म की बातों में अन्य धर्मों की तरह कहीं पर भी विरोधाभास नहीं मिलता। वेद-पुराण में लिखी हर एक बात का अर्थ ब्रह्म को ढूंढना ही है यानी उस सत्य को पता करना जो पूरे ब्रह्मांड में विद्यमान है। हमारे ऋषि-मुनियों की बातों में भी यही एकरूपता है, उन्होंने सत्य को जैसा देखा जैसा ही संसार के सामने प्रस्तुत कर दिया। लेकिन, बातों में विरोधाभास है तो उसके अनुवादकों में, उसे समझने वालों में।



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